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रांगेय राघव

1923 - 1962 | आगरा, उत्तर प्रदेश

प्रगतिशील कथाकार। कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना, अनुवाद आदि गद्य विधाओं के साथ-साथ पद्य लेखन में भी प्रवीण। 'मुर्दों का टीला' ख्याति का मूल आधार।

प्रगतिशील कथाकार। कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना, अनुवाद आदि गद्य विधाओं के साथ-साथ पद्य लेखन में भी प्रवीण। 'मुर्दों का टीला' ख्याति का मूल आधार।

रांगेय राघव की संपूर्ण रचनाएँ

कहानी 2

 

उद्धरण 50

जब काव्य समाज के प्रति उत्तरदायित्व नहीं रखता, वह किसी मतवाद के प्रति उत्तरदायी हो जाता है, तब उसका धर्म के ‘मूल’ अर्थ से तादात्य नहीं रहता और इस प्रकार जन-जीवन से भी संबंध छूट जाता है।

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महाकवियों की तो कला चेरी होती है, जब कि मध्यम कोटि के कवियों के लिए वह सहायक दिखाई देती है। निम्न कोटि के कवियों को तो शास्त्र का आधार लेकर ही जीवित रहना पड़ता है।

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जब प्रतिभा अपनी व्यक्तिपरकता में इतनी डूब जाती है कि उसका समाज से संबंध विच्छिन्न हो जाता है, तब उसका स्रोत सूख जाता है और उसका विस्तार भी रुक जाता है।

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स्त्री की बुद्धि चंचल और विनाशकारी होती है।

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किसी भी युग का काव्य तब ही जनमानस में उतरता है, जब वह जीवन का सांगोपांग चित्रण करता है। सृष्टि की मूल समस्या, समाज की व्यवस्था, प्रकृति, व्यक्ति, और समस्त वस्तुओं का चित्रण साहित्य का अधिकार है। इन सब का चित्रण जब भावपक्ष से सानिध्य स्थापित करता है, तब ही वह काव्य है।

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पुस्तकें 28

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