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रमेशचंद्र शाह

1937 | अल्मोड़ा, उत्तराखंड

रमेशचंद्र शाह की संपूर्ण रचनाएँ

कविता 5

 

उद्धरण 3

विलगाव की स्थिति में, आधुनिक जीवन की अधिकाधिक यांत्रिक और जनसंकुल परिस्थितियों में, मानव समुदायों के आस्तित्विक और सांस्कृक्तिक लयभंग के मानसोपचार की ज़रूरत के तकाज़े से ही; प्रकृति के साथ मानवीय चेतना के संबंधों की खोज, जीवन की औपन्यासिक पुनर्रचना में और भी गहरे और भी सूक्ष्मतम घरातलों पर अनिवार्य उठती है।

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औपन्यासिक चरित्रों की अंतर्यात्रा और सामाजिक परिस्थितियों का चित्रण-उ‌द्घाटन, एक-दूसरे से असंबद्ध और स्वायत्त ही हों—यह कदापि आवश्यक नहीं।

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संवेदन की तीव्रता, गहराई और सृजनात्मक परकायाप्रवेश की प्रतिभा, मात्र जीवन की घटना-बहुलता या मात्र संयोगाश्रित सुख-दु:ख-प्रचुरता पर निर्भर नहीं हुआ करती।

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पुस्तकें 6

 

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