तुम्हारा हर काम और हर खेल मग़रिबी (पश्चिमी) है, तुम हारे तो क्या और जीते तो क्या! बल्कि दुःख तो ये है कि तुम उनकी नक़ल उतारने में कभी-कभी जीत भी जाते हो।
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मैं भी बहुत अजीब हूँ, इतना अजीब हूँ कि बस, ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं।
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इस समाज में हमारी दाहिनी तरफ़ भी झूठ है और बाईं तरफ़ भी। सामने भी और पीछे भी, झूठ ही झूठ है जिसके सबब ये झल्लाहटें हैं और खोट ही खोट है जिसके बाइस ये झुँझलाहटें हैं।
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एक शख़्स अपनी ख़ुशी के लिए दूसरे का दिल दुखाता है।
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मुशायरा एक ऐसा ख़तरनाक हंगामा है जिसमें शाइर की इज़्ज़त लम्हा-लम्हा ख़तरे की ज़द में रहती है।
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