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देवीशंकर अवस्थी

1930 - 1966 | उन्नाव, उत्तर प्रदेश

सुप्रसिद्ध आलोचक, रंग-समीक्षक और गद्यकार। उनकी स्मृति में ‘देवीशंकर अवस्थी स्मृति सम्मान’ प्रदान किया जाता है।

सुप्रसिद्ध आलोचक, रंग-समीक्षक और गद्यकार। उनकी स्मृति में ‘देवीशंकर अवस्थी स्मृति सम्मान’ प्रदान किया जाता है।

देवीशंकर अवस्थी की संपूर्ण रचनाएँ

आलोचनात्मक लेखन 1

 

उद्धरण 38

कोई कृति अपने आप में एकांत सत्य नहीं होती है, वह अपने समय तक की परंपरा की अंतिम कड़ी भी होती है।

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जन-मन की गाए बिना साहित्य में शाश्वत होने की क्षमता नहीं।

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भावजगत की वस्तु को आकार देने का प्रयास—ऐसा आकार देने का प्रयास; जिससे कि वह भाव अधिक से अधिक संप्रेष्य बन सके और अन्य चित्रों में भी वैसी ही दीप्ति या द्युति उत्पन्न कर सके—कलाकार का लक्ष्य होता है।

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कोई भी कृति नितांत वैयक्तिक नहीं होती; वह अपनी परंपरा की उस युग तक की अंतिम कृति होती है, जिससे कि नई परंपरा का नैरंतर्य भी क्षरित हो सकता है।

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वास्तव में श्रेष्ठ साहित्य की रचना, परंपरा के भीतर युग के यथार्थ को समेट कर होती है।

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