घंटी
केशवानी साहेब कुर्सी को ऐसे देख रहे थे जैसे उन्होंने पहले कभी कुर्सी को देखा न हो। यूँ इस तरह पहले उन्होंने कभी कुर्सी को देखा भी नहीं था कि कैसे लोहे के एक पाइप को मोड़कर कुर्सी का एक ढाँचा बनाया गया है। पाइप में कहीं कोई जोड़ नहीं है। फिर उन्होंने