आषाढ़स्य प्रथम दिवसे

ashaDhasya pratham diwse

सोम ठाकुर

सोम ठाकुर

आषाढ़स्य प्रथम दिवसे

सोम ठाकुर

और अधिकसोम ठाकुर

    फिर

    मन आषाढ़ हो चला

    तैरती रुई धुनी हुई।

    बंद हवा लिखती है देह भर पसीना

    दीवारों में कसी हुई।

    माथे पर हाथ रखे बैठी है

    तबियत होकर छुईमुई।

    चप्पा-चप्पा खड़ी उमस

    परत-दर-परत चुनी हुई।

    बूँद-बूँद गल कर हम भीड़ों में

    बहते हैं हिम-नदी सरीखे।

    हम खंडित इंद्रधनु उठाए

    इस्पाती भाषा में चीख़े।

    बादामी कानों तक आकर

    सुनो बात अनसुनी हुई।

    पुल से, चौराहों से गुज़रती नज़र ने

    बोया थर्राता भटकाव।

    ढोता है भार पारदर्शी

    माथे की नसों का तनाव।

    रंगहीन हो चला शहर

    पिटी शाम साबुनी हुई।

    स्रोत :
    • पुस्तक : नवगीत दशक (पृष्ठ 33)
    • संपादक : शंभुनाथ सिंह
    • रचनाकार : सोम ठाकुर
    • प्रकाशन : पराग प्रकाशन
    • संस्करण : 1982

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