Font by Mehr Nastaliq Web

युद्ध के बाद बचा रह गया शहर

yuddh ke baad bacha rah gaya shahr

सुमन शेखर

सुमन शेखर

युद्ध के बाद बचा रह गया शहर

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    एक

    यहाँ अब भी वही गंध है

    लेकिन उसके साथ चिपकी हैं धूल,

    सड़ी हुई लाशों की गंध,

    मौत की चीख़ें, क्रूरता की हद को पार करती हँसी और अट्टहास,

    एक-एक कर मैं चुनूँगा सारे टुकड़े

    जिसने बसाया हो घर, वो एक-एक टुकड़े का महत्व जानता है

    युद्ध के बाद मलबे में सिमट आया शहर

    इतिहास में भी मलबे की शक्ल में ही दर्ज़ रहता है

    युद्ध कुछ भी नहीं देता,

    छिनता है सब जो भी बचाया जा सकता था

    विध्वंश के बाद बचा रह गया रोता है अपनी क़िस्मत पर

    खोया है मैंने अपना सब कुछ लेकिन

    चेहरे पर हैरानी का कोई वजूद नहीं

    कोई आँसू नहीं, कोई दुःख नहीं

    शायद बाद के लिए बचा रखा हो।

    होगा बाद में!

    दो

    बम-बारूद से बसा हुआ शहर लाशों की ढेर में बदल गया

    धरती से उठी हाय

    कुछ ने कहा वाह

    कुछ की चीख़ों से पट गई धरती

    कुछ तब भी बैठे रहे हाथ पर हाथ धरे

    जैसे किसी और दुनिया की हो बात

    जबतक समस्या ख़ुद पर नहीं आती वह दूर की ही लगती है

    मेरा दिल मेरे पैरों के नीचे लगा है

    दिल धड़कता है ज़ोरों से जब-जब बढ़ाता हूँ अपने चिथड़े हुए क़दम

    सारी चीख़ें धूल में मिलती जाती हैं

    बहुत हल्के से लगते हैं मेरे दर्द की चीख़ें तुम्हें!

    पूरा शहर मेरे दर्द को ढोता रहा, एक आह सुनी मैंने

    गुजरो जो कभी सन्नाटे में तुम

    संभाले रखना अपना दिल

    काश ऐसा होता कि मेरे ज़ख़्म की सूरत

    लगाए रखते तुम अपने पास बहुत भीतर

    तो बंट जाती मेरी चीख़

    मेरे दर्द

    मेरी तबाही का हर मंज़र

    उतर जाता गर तुम्हारे आँखों से

    काश ऐसा होता कि तुम भी बिखर पाते शर्म से गड़कर।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY