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यथारूप

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पल्लवी जयराम

और अधिकपल्लवी जयराम

    सबको याद हैं प्रेम कविताएँ

    प्रेम पर आधारित उपन्यास

    संभवतः सबसे ज़्यादा पढ़े गए

    आजकल फ़िल्मों में

    प्रेम का बड़ा चलन है।

    धर्म बेचना हो किसी पंडे को

    या फिर करवाना हो

    विज्ञापन किसी उत्पाद का

    सब कामों में प्रेम का

    सहारा लिया जाता है।

    बहुत ख़र्च होता है प्रेम

    इस महँगाई में।

    इसलिए ही सबके दिल रीते हुए हैं

    रिश्तों से ग़ायब हो गया

    बाज़ारीकरण होने से।

    मुक्ति फिर भी संभव है।

    हम भाग सकते हैं

    इस बाज़ार से दूर

    कहीं किसी पर्वत या नदी के पास

    जहाँ फल, फूल, पत्ते मिलें

    समुद्र ख़ुद दे दे मछलियाँ

    बिना मोल के।

    लेकिन हमारी पूरी ताक़त

    पड़ी बेड़ियों की सुरक्षा में व्यय हो रही है।

    तभी कहीं सरगम नहीं

    कोई काव्य जीवंत नहीं

    सब चित्र यांत्रिक और

    सब आशिक स्मृति में खोए हैं।

    स्मृति बन जाना प्रेम की

    नियति होती जा रही है।

    जो प्रकृति को स्वीकार नहीं

    उसे यह चक्र

    स्वतः बाहर फेंक देता है।

    विलुप्त हो गए

    जिनकी उपस्थिति यहाँ

    प्रासंगिक नहीं।

    जो कुछ अवांछनीय है

    टिक ही नहीं सकता यहाँ।

    यदि संशोधन इतना अनिवार्य होता

    अब तक लागू हो चुका होता

    तुम पर

    अनुकूलन का सिद्धांत।

    तुम्हें तुम्हारी

    ख़ुदरंगी निखार रही है

    इसका सीधा मतलब है

    प्रकृति ने तुम्हें, सहर्ष स्वीकारा है;

    पूरी जीवंतता से।

    तुम्हें तलाश करनी चाहिए उसकी

    जो तुम्हें स्वीकार करे

    प्रकृति की तरह

    तुम्हारी संपूर्णता में।

    यथावत;

    यथारूप,

    प्रकृति-स्वरूप।

    तुम स्वागत करना उसका

    जो तुम्हारे जीवन में

    बारिश कर दे प्रेम की

    व्यापार, बाज़ार, प्रचार से परे।

    स्रोत :
    • रचनाकार : पल्लवी जयराम
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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