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यदि चल देना संभव होता

yadi chal dena sambhav hota

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

वैस्ना पारुन

वैस्ना पारुन

यदि चल देना संभव होता

वैस्ना पारुन

और अधिकवैस्ना पारुन

    यदि चल देना संभव होता, घोड़े पर बैठ जाना संभव होता

    और सदा के लिए चला जाना, या भुलावा देना किसी पुरानी

    नाव को

    कि हमें शहर से ले जाए,

    मित्र छोड़ जाता मित्रों को, माँ अपने बच्चों को।

    घर ढह जाते आँसुओं से उनके जो रह जाते

    पर्वत हो जाते हरे-भरे गीतों से उनके जो जाते।

    मैं जानती किसके साथ भोर की करूँ प्रतीक्षा

    जो रोते हैं उनके साथ, या जो गाते हैं उनके साथ।

    क्योंकि जो रोते हैं धीरे-धीरे चुप हो जाएँगे,

    ऊब जाएँगे गीतों से जो गाते हैं।

    मैं तो कभी जाऊँ घोड़े पर ही नाव पर

    क्योंकि दूर हैं पहले से ही जिनको मैं समीप रखने की

    इच्छुक थी।

    क्योंकि भागना मुझे किसी से नहीं। क्योंकि भय मुझे वापसी

    का है।

    लेकिन यदि संभव होता सदा के लिए चला जाना, वास्तव में

    गीत के साथ चला जाना

    ख़याल है कि देर बहुत लग जाती उन जगहों से विदा होते जहाँ

    मैं रोई थी।

    और कभी भूल पाती उनको जो मेरे कारण एक बार भी

    मात्र उल्लसित हुए हों और जो मुस्कराते विदा देते मुझको।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 119)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : वैस्ना पारुन
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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