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याचक

yachak

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    मैंने ढूँढा है तुम्हें

    स्त्री की सारी शक्लों में

    तुम और ज़्यादा याद आती रही

    मैं उन दिनों में और ज़्यादा पगलाया रहा

    तुम रूई में तब्दील हुई कपास के पेड़ पर टिकी थी

    मैं याचना में निरत ऊपर तकता हुआ उम्र फूँकता रहा

    तुम उतरीं

    मैं बढ़ पाया आगे कहीं

    बरस बीते

    तुम्हें अब रूई की शक्ल में तकता हूँ

    मन को मारता

    तुम्हारे स्पर्श के इंतज़ार में डूबा हुआ मैं

    मन से हठी तुम

    हर बार परीक्षा को और कड़ा करती जाती हो

    तुम अनंत के मेघ में छिपी बूँद हो

    मैं धरती का रेत जो प्यासा है

    तुम्हें पाने के लिए

    ढूँढना होगा एक छद्म नाम या चेहरा!

    शहर में बेचैनी है सांस भरने की

    तुम धरती की वो बिंदु रहीं

    जहाँ सांसें सबसे मुफ़ीद रहीं

    मैं तुम्हें देखता हूँ

    देखता हूँ लगातार अंतहीन सपनों में भी

    मेरा देखना गीला उबटन है

    तुम तितलियों सी इठलाती हो

    मैं हवा-सा चूमता हूँ तुम्हें

    कहने को तुम रहीं हमेशा मेरे पास

    जैसे पेड़ धँसा होता है ज़मीन में

    तुम मुझमें रहीं

    मैंने सुना नहीं तुम्हें।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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