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वह, सड़क और मर्टिल

wo, saDak aur gartil

रोखेलियो सिनान

रोखेलियो सिनान

वह, सड़क और मर्टिल

रोखेलियो सिनान

और अधिकरोखेलियो सिनान

    वह, सड़क और मर्टिल1 2

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    मेरे अंतर्मन के केंद्र तले-ऊँचा पुल

    गुज़रते चिराग़ यादों के।

    फ़ासला, बसता है जो अब तारों में,

    हटाता चकाचौंध। पास आता

    और लौट आते हैं फिर वो सड़क, और वह

    और बाग़ीचा और मार्टिल।

     

    ज़िंदगी थी मेरे पास वहाँ

    चोंच में पकड़े कार्नेशन और गुलाब जैसे

    और आज तक पंछी-आसमान

    फड़फड़ा रहे हैं उसकी आँखों में

     

    मुक्ता-सा चमकता पत्ता

    और लालिमा से फूटता गीत

    टहनी और घोंसले की तरफ़।

    चिल्ला पड़ता हूँ मैं रोशनी पर: यूँ ही रहना रोशन!

    (मुझे चाह हैं बाँह की

    रहूँगा भ्रमित वहीं)

     

    आह, मगर फिर आ गई छाया,

    और ऊपर उठी उड़ान!

    उभर आई लहर! उतावली हो उठी भोर

    मेरे अंदर की हवा से!

    मुक्ता पत्र, कहाँ?

    कहाँ है वह गीत? गुलाब?

    रात्रि है केवल। मेरे अंदर और बाहर

    निर्वस्त्र काली ख़ामोशी

    और दौड़ा मैं बावरा

    बोता बीज अपनी चीख़ों के।

     

    दौड़ थी वह हवा की

    बहुत तेज़ रफ़्तार-तूफ़ानी।

    नज़रें टिकी हुईं राह पर

    और हाथ परचम पर।

     

    मेरे आत्मा के छोटे तारे ने

    मुझे चुपके से कहा : बढ़े चलो!

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 205)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

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