Font by Mehr Nastaliq Web

तुम ही कहो

tum hi kaho

सुमन शेखर

सुमन शेखर

तुम ही कहो

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    कमरे में हर तरफ़ है धूल का तिलिस्म

    धूल पर उंगलियाँ फिराकर उगाता है वह कई-कई नाम

    कभी वहाँ कोई आकृति उभर आती है

    उभर आता है सन्नाटा सन्नाटे के भीतर से

    उभर आता है एकांत, अकेलापन, निराशा

    महीनों से बंद पड़े कमरे के भीतर

    हवा से अधिक भारी हो चुकी है उसकी देह

    उसके देह के से झाँकती आखें टकटकी लगाए ताकती है दीवारों को

    खिड़की के शीशे पर चोंच मारती चिड़िया को

    सीलिंग से झूलती पपड़ी को

    महीनों हुए उसने कोई आवाज़ नहीं सुनी

    सिवाये चुप्पी की सरसराहट के

    उसके मुँह तक उग आया है शैवाल

    आँखों के कोर पर फैली हैं जड़ें उसकी

    समूची पृथ्वी के पास नहीं है ऐसा कोई हाथ

    जो उस तक पहुँच जाए थामने को

    उसके ठीक बाद के कमरे में मनाया जा रहा है जन्मदिन

    कभी उसके बाद के मकान से आती है आवाज़ प्रेम वर्षगाँठ की

    घर के ठीक बाहर तक समंदर भी आता है उन्मादित होकर

    बाहर हर तरफ़ सुख ही सुख है

    भीतर!!

    खिड़की की ओट से निकलती हुई हवा और टुकड़े भर रौशनी ने

    बचा रखा है उसके होने का वजूद

    कहते हैं

    जले हुए बर्तन, खारा पानी का बास,

    धूसर फ़र्श, गंदे-मटैले कपड़े, बंद दरवाज़ा, धँसा बिस्तर

    पचा गया उसको।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY