बस में

और अधिकअंकुश कुमार

    मैं निकलता हूँ घर से

    बस स्टैंड पर पहुँचता हूँ

    धूप में गला तर करने को

    देखता हूँ पानी का ठेला

    एक रुपए का सिक्का ढूँढ़ता हूँ

    और झुँझलाहट लिए

    वहीं खड़ा हो जाता हूँ

    स्टैंड पर बस आती है

    मैं अपने समूचे अस्तित्व को बस में ठेलता हूँ

    और अपने पैरों के लिए जगह तलाशता हूँ

    टिकट लेने के बाद महसूस करता हूँ

    ग़लत पतों और ग़लत बसों ने मुझे

    आजीवन यात्री बनाए रखा

    भीड़ से बचने को दरवाज़े की ओट से लगकर

    हो जाता हूँ खड़ा

    उतरने के लिए एक ग़लत स्टैंड चुनता हूँ

    और अपने आपको फिर से पाता हूँ

    एक ग़लत बस का इंतज़ार करते हुए

    स्रोत :
    • पुस्तक : आदमी बनने के क्रम में (पृष्ठ 44)
    • रचनाकार : अंकुश कुमार
    • प्रकाशन : हिन्द युग्म
    • संस्करण : 2022

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