Font by Mehr Nastaliq Web

वीकएंड के जीव

vikenD ke jeev

आरमांदो गाँसालेस तोर्रेस

और अधिकआरमांदो गाँसालेस तोर्रेस

    वीकएंड के जीवों ने

    दूषित कर लिया है अपना सारांश

    आकर्षक रोगों से

    पर उनकी साँसों का उतना महत्त्व नहीं है

    जितना उस उन्माद का, ख़त्म होता है जो हर सफ़र में।

    तुम्हें मिल सकते हैं वे सस्ते बारों में : उनकी उन शुरुआती

    ढोंगी नज़रों के पीछे से प्रकट होने लगते हैं लिंग,

    टाँगों के बीच जानवरों से बोझिल, ढोते फिरते हैं नक़ली अतीत

    और रहते हैं खोज में एक सरल जीव की जो मुक्त कर सके उन्हें।

    उनकी भाषा की गिरफ़्त में जाना तुम

    फँस जाना उनके धोखों के मोहजाल में

    अपने हास्यापद आवेश में निगल जाते हैं वह

    उस अग्नि को भी

    शाश्वत थी जो।

    बार में जाओ, देखो उनके कूल्हों को,

    बेसाख्ता टकराओ उनसे, चश्म-ए-बद-दूर कहो,

    अपने सोने के दाँत पर इतराओ उनके आगे और

    मौक़ा मिलते ही

    पी जाओ उनकी तबाह हो चुकी शराब।

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 287)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY