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वतन के मेहनतकश मज़दूर खेत की माटी के सिंदूर

vatan ke mehanatkash mazdur khet ki mati ke sindur

उदय प्रताप सिंह

उदय प्रताप सिंह

वतन के मेहनतकश मज़दूर खेत की माटी के सिंदूर

उदय प्रताप सिंह

और अधिकउदय प्रताप सिंह

    उठो, मैं अपने गीतों में तुम्हें आवाज़ लगाता हूँ।

    तुम्हारे तन का पारस छू सुनहरी फ़सल लहकती है

    तुम्हारे बलबूते पर ही मिलों की कलें धड़कती हैं

    तुम्हीं ने नभ तक जादूगर ख़ाक से महल उठाए हैं

    तुम्हारे मस्तक की बूँदें सभ्य को सभ्य बनाए हैं

    तुम्हीं ने हुनर दिया मुझको, तुम्हीं को राह दिखाता हूँ।

    फूल में महक तुम्हारी है, बहारें तुमसे जीवित हैं

    चमन के माली क्यों अधिकार तुम्हारे फिर भी सीमित हैं?

    खेत में मेहनत तुमने की, तुम्हीं को तंगी का डर हो

    तुम्हारे घर में दीया जले, रोशनी और कहीं पर हो

    दीये के नीचे ही तम है वहीं में दीप जलाता हूँ।

    शक्ति के स्रोत बताता जा, रहेगा तू कब तक असहाय?

    अर्थ के उद्गम तनिक बता, सहेगा तू कब तक अन्याय?

    मनुजता का मुख तुमसे दीप्त, सभ्यता के तुम गहने हो

    गले में धर्म-जाति के तौक़ मगर तुम अब तक पहने हो

    आज से स्वर मेरे दर्पण तुम्हीं को तुम्हें दिखाता हूँ।

    निरर्थक प्रजातंत्र का शोर निरर्थक हैं ये जोग, विहाग

    मूर्ति तक जाता कोई नहीं मंदिरों से सबको अनुराग

    तुम्हारी ख़ुशहाली के बिना देश की ख़ुशहाली भी पाप

    खेत में फसलें खड़ीं उदास, बाग़ में कलियों को संताप

    उठो ऐ नीलकंठः तीसरे नेत्र की याद दिलाता हूँ।

    उठो, मैं अपने गीतों में तुम्हें आवाज़ लगाता हूँ

    स्रोत :
    • रचनाकार : उदय प्रताप सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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