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वर्तमान अतीत के दृश्य का बुरादा है

vartaman atit ke drishya ka burada hai

सुमन शेखर

सुमन शेखर

वर्तमान अतीत के दृश्य का बुरादा है

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    जब-जब तुम्हारी नज़र मुझपर पड़ती है

    मैं मार्च में खिले नए पत्तियों-सा गाढ़ा हरा हो जाता हूँ

    सोता हूँ तो मुझे तुम्हारे हथेली के सपने आते हैं

    जागता हूँ तो अँगुलियों से विस्तृत एक देह उकर आती है

    नींद में दिखता है फ़िल्मी पर्दा

    पलटकर देखता हूँ तो पाता हूँ

    मैं केवल अतीत में ही जीवित रहा

    वर्तमान में एक नन्हा पौधा हूँ

    जिसकी जड़ें उलझी है हड्डी के ढाँचो से

    पीकर ख़ून अपना ही क़ब्र के भीतर से

    सीना फाड़कर निकला हूँ बाहर

    टहनी पर उगे है अँगुलियों के फूल

    मैं उससे बनाता हूँ माला हमारे नाम का

    आँधी चलती है और एक बार में सब ठूँठ हो जाता है

    सोते में हर रात मैं हल्का हो जाता हूँ

    आँखें खुलती है, सुबह होती है

    तुम्हें देख मेरी देह का वज़न बढ़ता है

    तुम वर्तमान में अतीत के सुख की महक हो

    वर्तमान की दुपहरी अतीत के दृश्यों का बुरादा है

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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