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वक्त की शतरंज

vakt ki shatranj

शिवम् अवस्थी

शिवम् अवस्थी

वक्त की शतरंज

शिवम् अवस्थी

और अधिकशिवम् अवस्थी

    वक्त की शतरंज पर, बाज़ी पलटते देर कितनी?

    मुट्ठियों से रेत को, यूँ ही फिसलते देर कितनी?

    आज जो हँसता हुआ, यह कारवाँ-सा लग रहा है,

    कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो!

    कल तलक जो ताज पहने, चाँद तक उड़ने चले थे,

    ख़्वाब के कच्चे घरों को, जो सदा बुनने चले थे।

    वक्त की आंधी उठी तो, बुझ गए वो भी चराग़ अब,

    राख की उस ढेरी में, वो हस्ती शायद सो गई हो!

    कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

    जिनकी आँखों में हमारे, ख़्वाब पलते थे कभी तो,

    हाथ हाथों में लिए जो, साथ चलते थे कभी तो।

    आज उनके रास्ते भी, अजनबी से हो गए हैं,

    उम्र भर की वो वफ़ा भी, भीड़ में जब खो गई हो!

    कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

    साँस की इस डोर पर, इतरा रहा है आदमी जो,

    रेत के इस महल को ही, सच समझता आदमी जो।

    एक झटके में ही सब कुछ, राख हो जाएगा पल में,

    अश्क की उस धार में, हर मुस्कुराहट धो गई हो!

    कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

    स्रोत :
    • रचनाकार : शिवम् अवस्थी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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