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उयि अउर आयिं हम अउर आन!

uyi aur ayin hum aur aan!

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

उयि अउर आयिं हम अउर आन!

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

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    उयि अउर आयिं हम अउर आन!

    ( 1 )

    स्वाचति समुझति इतने दिन बीते

    तहूँ कहूँ खुलीं आँखी?

    काकनि यह बात गाँठि बाँधउ—

    उयि अउर आयिं हम अउर आन!

    ( 2 )

    उयि लाट कमहटर के बच्चा,

    की संखपतिन के पर - पोता,

    उयि धरमधुरंधर के नाती,

    दुनिया का बेदु लबेदु पढ़े,

    उयि दया करैं तब दानु देयिं,

    उयि भीख निकारैं हुकुम करैं,

    सब चोर-चोर मौस्याइति भाई,

    एक - एक पर गेरह हैं।

    तोंदन मा गड़वा हाथी अस—

    उयिं अउर आयिं हम अउर आन!

    ( 3 )

    उयि बड़े-बड़े महलन ते हँसि-हँसि

    लाखन के व्यउहार करैं;

    घंटिन ते चपरासी ग्वहरावैं

    फाटक पर घंटा बाँधे हैं।

    गुर्राय उठै आँखीं काढ़े

    पदढिट्ठी कै भन्नायि जायँ।

    उयि महराजा, महंत दुनिया के

    अक्किल वाले ग्यानवान।

    अक्किल ते अक्किल काटि देयिं—

    उयि अउर आयिं हम अउर आन!

    ( 4 )

    काकनि, तुमार लरिका बिटिया,

    छूढ़ा पानी पी हरु जोतैं,

    उनके तन ढकर ढकर चितवैं

    बसि कटे पेट पर मुँहुँ बाँधे।

    मलकिनी दुरदसा की मारी

    खाली हाथन भुकुरयि लागैं।

    उयि राजि रहे उयि गाजि रहे—

    उयि अउर आयिं हम अउर आन!

    ( 5 )

    हम लूकन भउकन पाला पथरन

    बीनि - बीनि दाना जोरी,

    की बड़े-बड़े पुतरी-घर भीतर

    मूड़ हँथेरी धरे फिरी?

    चूरै हालीं नस - नस डोली

    यी राति दउस की धउँपनि मा,

    तब यहै भगति और भलमंसी

    हम हरहा गोरू तरे पिसे।

    पंचाइति मा तुम पूँछि लेउ—

    उयि अउर आयिं हम अउर आन!

    स्रोत :
    • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 148)
    • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
    • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
    • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
    • संस्करण : 1998

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