गार्था के साथ फ़्लोरेंस में
gartha ke saath florens mein
अँधेरा घिरने लगा और सर्दी बढ़ने लगी।
निराश्रयता।
शाम दाख़िल होती है सपने में
और मुड़ती है अपनी नाँद की तरफ़ जैसे
लौटते हैं थके हुए घोड़े अपने अस्तबल को
हवा से सरकती रात में।
ढँक लेती है रात हवा को
ढँक लेती है रात सोने वाले को और न सोने वाले को
वह सो रही है। मैं जाग रहा हूँ
मैं सुन रहा हूँ उसकी साँसों की लय
दिनों के ख़िलाफ़ उसका प्रेम युद्ध
सुन रहा हूँ मस्त धड़कन उसकी किताबों की
शब्दों और आवाज़ों की उसकी तलवार की।
ढेर लगा है रात के बर्तनों का।
और रसोई के उस कोने में
किसी सिमटकर सोए पंछी की तरह
सुनी जा सकती है ज़िंदगी की असीम साँस।
हम मिलते हैं अक्सर
घंटों की किसी अनपेक्षित वापसी में
और हम ज़्यादा थक जाते हैं, क्योंकि ज़्यादा बूढ़े हो चले हैं हम
शायद ज़्यादा दुःखी भी। और शायद शांत।
यही था ज़िंदगी में हमारे हिस्से का कोटा
जीवन में मृत्यृ में प्रेम में द्वेष में
और पुनः प्रेम
और इच्छा
और कोशिश
और थकान
और हम फिर बातें करने लगते हैं
कुछ मैं कहता हूँ कुछ वो कहती है
मैं बताता हूँ उसे अपने मरे भाई के बारे में
और हम दोनों याद करने लगते हैं
उसकी वह नीली आँखें
इतनी नीली की सामने वालों की आँखें तक नीला कर देतीं
मैं बताता हूँ उसे बनारस की एक सुबह के बारे में
(भारतीयों ने उसका कितना ख़ूबसूरत नाम रखा है वाराणसी)
मैंने देखा एक कुत्ता
जो खा रहा था कान एक लाश का
और बताता हूँ उसे
कि मेरे भाई की रोशन देह
रंग चुकी थी अभी से
सड़न की कालिमा में
क्योंकि सब मौतें एक-सी होती हैं बराबर होती हैं
और हमेशा क्रूर होती हैं
और हमेशा उसकी छाया
रहती है हमारे आगे पीछे या हमारे अंदर।
मैं बताता हूँ उसे कैसे सोचता हूँ कभी
कि बादल सफ़ेद चरवाहे हैं
जो तैयार कर रहें हैं पुनर्जीवन की लाल मेज़
और वही होंगे बैठे हम सब शांत
एक-दूसरे को मेज़ के शीर्ष की तरफ़ देखते
जहाँ से देख रहा होगा हमें ईश्वर।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 181)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
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