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उनकी चाह

unki chaah

दुर्गेश कुमार सजल

और अधिकदुर्गेश कुमार सजल

    लोग तो यह भी चाहते थे।

    खोले जाएँ स्कूल के द्वार,

    उनसे पहले नहाने ना जाएँ,

    वे नदी के घाट पर।

    उनके कुएँ में ना डुबाएँ,

    वे अपनी गागरें, गुंड कसैंड़ी।

    भोग लगाने ना चढ़ें,

    वे चबूतरे के ऊपर।

    भोजन करने नहीं बैठें,

    वे आँगनों, दहलानों की पंगत में।

    उनके बीच में, बना ना पाएँ।

    वे अपने टपरे।

    करवा ना सकें, कटिंग

    उनके नाई से।

    और उन्होंने कहा,

    सौ करोड़ लोग जो चाहते हैं।

    वही कर रहे हैं, इसमें क्या ग़लत है?

    उनका यह तर्क, तर्क ही तो नहीं है।

    हथकंडा है विशुद्ध हथकंडा,

    उनकी सत्ता बचाने का

    स्रोत :
    • रचनाकार : दुर्गेश कुमार सजल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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