एक आत्मकल्पित दास्ताने के अंतिम छोर
पर जब मैं नदियों और महासागरों को गाने का प्रयास कर रहा था
वे किन्हीं शांत स्पंदित ग्राम सरोवरों का संगीत बनकर आईं
और मेरी स्नायुओं में जलकुंभियों की तरह बिछ गईं
जब मैं आत्मबिखराव के गहरे निस्पंदन में चुप्पी
और कोलाहल की शैवालें बिछा रहा था
वे निचाट दुपहरी के तालाब में पनडुब्बियों की तरह
आईं और चेतना की परतों पर अपने सुंदर पदचिह्न छोड़ गईं,
मैं अनसुना था
जब उन्होंने मुझे सुना
गहन बिखराव के वातायन में
उन्होंने मुझे बुना
उन्होंने मुझे गिराया, उठाया फिर सँभालते हुए विदा किया
न जाने जीवन में कितनी आपूर्तियाँ थीं
और अनाम स्वभाविकताओं के कितने असंख्य कोण,
लेकिन वे जब भी आईं
चिट्ठियों की तरह आईं और डाकियों के वेश में लौट गईं।
- रचनाकार : ऋषभ पाण्डेय
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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