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टूटता तारा और तुम

tutta tara aur tum

हर्षिता त्रिपाठी

हर्षिता त्रिपाठी

टूटता तारा और तुम

हर्षिता त्रिपाठी

और अधिकहर्षिता त्रिपाठी

    दिसंबर की अँधेरी सर्द रात में

    दूर कहीं खेतों के उस पार

    एक तारा टूट रहा था

    मैं खेतों के पास छत पर खड़ी

    देख रही थी उस टूटते तारे को

    वह अधजला तारा

    ठंड से काँप रहा था

    और खोज रहा था कि

    धरती पर कोई तो उसे बचा ले

    उसके आशा भरे नेत्र

    जब मुझ पर पड़े

    वह और ज़्यादा चमकने लगा

    उसे लगा मैं बचा लूँगी उसे

    तभी मैंने उससे तुम्हें माँग लिया

    उसकी चमक में उदासी छा गई

    वो मायूस होकर मुझे तकने लगा

    और घुटने लगा

    मेरे अंदर के कमीनेपन से

    दिसंबर की ठंड और

    उस घुटन ने

    उसकी चमक को

    धीरे-धीरे मार दिया

    और फिर वह बुझ गया

    मैं जब कभी तुमसे मिलने आऊँगी

    लाऊँगी एक तोहफ़ा तुम्हारे लिए

    दूँगी तोहफ़े मे वही

    बुझा-बुझा उदास तारा

    तुम अगर उस तारे को पहनोगे

    तो शायद

    उसकी चमक वापस जाए

    वह फिर से चमकने लगे

    स्रोत :
    • रचनाकार : हर्षिता त्रिपाठी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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