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तुम्हें प्यार करते हुए

tumhein pyaar karte hue

जयंत शुक्ल

जयंत शुक्ल

तुम्हें प्यार करते हुए

जयंत शुक्ल

और अधिकजयंत शुक्ल

    समाज के इन कठिनतर दिनों में

    मनुष्य

    अपनी अस्मिता खो रहे हैं

    सो रहे हैं मेंढक

    कुछ छिपकलियों का ख़ून

    जम चुका है

    ठंड में ठिठुर रहे हैं

    सड़क के कुत्ते।

    मैं कवि हूँ

    परंपरा से बँधा हूँ

    इसलिए घुमाकर बात कहूँ

    तो यह संसार एक पेड़ है

    और अब इस पर

    सिर्फ़ एक पत्ती बची है

    प्रेम नाम की।

    यह पेड़ अजीब लगता है

    लेकिन

    कम से कम

    एक पेड़ तो लगता है

    टेढ़ा खड़ा एक ठूँठ तो नहीं।

    मैं कवि हूँ

    आधुनिकता के बोध से भरा,

    सीधी बात कहूँ

    तो तुम्हें प्यार करते हुए

    मैंने जाना कि

    मैं देह से ही नहीं

    हृदय से भी

    मनुष्य बचा हुआ हूँ।

    स्रोत :
    • रचनाकार : जयंत शुक्ल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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