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तुम्हारी किताब होना

tumhari kitab hona

रिदम राही

रिदम राही

तुम्हारी किताब होना

रिदम राही

और अधिकरिदम राही

    तुम मुझे ऐसे पढ़ती हो

    जैसे मैं तुम्हारी लिखी हुई किताब हूँ।

    तुम मुझे बेशक पढ़ती हो आँखों से

    पर आँखों से नहीं, साँसों की जिल्द में बांधकर

    मेरी हर भावना का पन्ना ख़ुद में समेटकर रखती हो।

    तुम उसी आत्मीयता से मुझे देखकर रखती हो

    मेरे जज़्बातों की स्याही,

    जिसमें तुम्हारे प्रेम की बूँदों के छींटों से

    शब्द-शब्द बन गए हैं

    और वही शब्द ज़िंदगी बन गए हैं।

    शब की खूँटी पर टाँगी हुई अनकही दास्तान

    जो तुम्हारे ख़्यालों से

    भोर से पहले के मीठेपन से मुझे जगाते रहे हैं

    फिर उन्हीं जागी हुई आँखों से सवेरा हुआ।

    हाँ, वो माथे पर छोटी-सी बिंदी चंद्रमा-सी

    तुम्हारी लटों के झरनों के बीच

    ऐसे ही झरोखों से कितनी कविताएँ

    मुझ तक चली आती हैं,

    तुमको निहारते हुए उनमें मैं आता हूँ।

    ऐसे ही कुछ चीज़ें कैद हो जाना भी अच्छा ही है

    अच्छा है जीने की कोई वजह पास होना,

    अच्छा ही है मेरा तुम्हारी एक किताब होना।

    कविताओं की वो किताब

    जिससे किसी को कोई शिकायत भी ना रहे,

    ना जिस पर जग का पहरा रहे,

    पर हमारी प्रेम की यादों का हर अक्षर

    हर पंक्ति जिसमें सुनहरी रहे।

    हां, ऐसी ही किताब बनकर मैं तुममें लौटूँगा,

    तुममें समाहित होने,

    तुम्हारी ही किताब बनकर,

    दुनिया जहाँ से परे

    कभी ना टूटने वाला साथ बनकर।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रिदम राही
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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