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तुम्हारे शब्दों के ख़िलाफ़

tumhare shabdon ke khilaf

सुशील कुमार

सुशील कुमार

तुम्हारे शब्दों के ख़िलाफ़

सुशील कुमार

और अधिकसुशील कुमार

    अपनों की दुतकार से

    किसी खंजर के वार से

    मैं सबसे ज़्यादा

    उन शब्दों से आहत हूँ

    जिसे देते हुए तुमने

    मेरी पीठ थपथपाई थी।

    ये शब्द बताशे की तरह मीठे थे

    पर एकदम जहरीले थे

    हलक में उतरते ही इसने

    मेरे सब संवेदी शब्द मार गिराए

    और मेरी भाषा नाकाम हो गई।

    बुद्धि भी मेरी मात खा गई।

    इन शब्दों से अब तक

    तो कोई कविता बन सकी,

    कोई गीत

    लोरी, प्रार्थनाएँ ही

    चैन और चमन को लूटा है सिर्फ़ इन शब्दों ने।

    अब मैं समझ सकता हूँ

    तुम्हारे शब्दों की बानगी

    इनके अँखुवे वहीं फूटते हैं

    जिस ज़मीन से अपराध के कनखे निकलते हैं

    क्योंकि तुम्हारी भाषा की नंगी पीठ

    जिन हाथों ने सहलाए हैं

    उन्हीं हाथों ने उड़ाएँ हैं शब्दों के जिन्न

    सुरखाब के पर लगाकर

    सब ओर दिगंतों तक।

    इसलिए हर बुर्ज़, हर इलाक़े में

    गुप्त हो रहे हैं तुम्हारे शब्द अब।

    क्यों इन शब्दों की एक गठरी बनाकर

    तुम्हारे चौखट के नीचे ज़मींदोज कर दूँ?

    और लौट आऊँ नि:शब्द अपने घर।

    फिर असंख्य मौन दग्ध होठों को जगाकर

    तुम्हारे शब्दों के ख़िलाफ़

    एक जंग का एलान कर दूँ!

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुशील कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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