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तुम उसका मन छूना

tum uska man chhuna

रेणु मिश्रा

रेणु मिश्रा

तुम उसका मन छूना

रेणु मिश्रा

और अधिकरेणु मिश्रा

    उसने अपना तन तो तुम्हें कई बार सौंपा

    क्या तुमने कभी उससे पूछा

    कि कितनी बार सौंपा उसने

    तुम्हें अपना मन

    कब उसने तुमसे प्यार किया

    बिना उस दबाव के

    कि तुमसे प्यार करना उसका दायित्व है

    उसे उसका निर्वाह करना ही होगा।

    कभी देखा या महसूस किया

    उसके चेहरे पर उभरे अनगिनत भावों को

    या आँखों में उतर आए उस प्यार को

    जो कि ‘मैं तुमसे प्यार करती हूँ।’

    जैसे वाक्यों को कह देने से बढ़कर है

    कभी उसके बदन के ठंडेपन से जाना

    कि उस वक़्त वह सिर्फ़ तुमसे

    बात करना चाहती है,

    तुम्हारे साथ रहना चाहती है

    उसे तुम्हारे स्पर्श में

    किसी कामना की बू नहीं चाहिए

    बस इतना चाहिए कि तुम हाथ थामों तो

    वह अपनी यात्रा में तुम्हे शामिल कर ले

    ले जाए तुम्हें मन के अनछुए किनारों पर

    जहाँ से लौटने के बाद

    कभी भी मन अतृप्त नहीं रहता

    इसलिए अगली बार बिना किसी हड़बड़ी के

    बिना किसी अकुलाहट के

    बिना किसी पुरुषत्व भरे दबाव के

    तुम उसका मन छूना

    और चाहो तो सौंप आना अपना मन

    बिना किसी अपेक्षा के

    उसे देखना,

    तो पूरे मन से देखना,

    और महसूस करना कि

    वह सौंप चुकी होगी ख़ुद को,

    तुम्हें, अपने मन की गहराइयों से!

    स्रोत :
    • रचनाकार : रेणु मिश्रा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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