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तुम कर सकते हो कोई भी बात

tum kar sakte ho koi bhi baat

सुमेधा

सुमेधा

तुम कर सकते हो कोई भी बात

सुमेधा

और अधिकसुमेधा

    लोगो

    कितने सारे काम हैं

    कितने सारे मुद्दे

    कितने अहम

    सब कुछ तो बिखरा पड़ा है

    तुम्हारा गाँव शहर देश

    तब क्यों

    मेरी बिखरी ज़िंदगी में

    इतनी रुचि

    बातों की भी तो

    कोई कमी नहीं है

    तुम कर सकते हो

    कोई भी बात

    मसलन

    शहर में बढ़ते प्रदूषण

    या आगामी चुनाव के विषय में

    तब क्यों

    मेरे बारे में बतियाते हो

    समझ सकती हूँ

    तुमने बचपन में देखा होगा स्वप्न

    बड़े होकर न्यायाधीश बनने का

    वह स्वप्न अधूरा रह गया

    इसका मुझे भी अफ़सोस है

    पर इसका ये परिणाम जायज़ तो नहीं

    कि तुम खोल लो अपनी ही अदालत

    अगर तुम बेरोज़गार हो तब भी

    तुम लगा सकते हो ठेला

    बना सकते हो पकौड़े

    यह बातें बनाने से इसलिए भी बेहतर है

    क्योंकि इससे पेट भरता है

    घरों पर चलाए जा रहे हैं बुल्डोजर

    तुम्हारे आस पास

    और भी तो कई चीज़ें

    टूट रही हैं

    सड़क पुल स्कूल

    और उमर ख़ालिद की आशा

    तब तुम किस तर्क से जायज़ ठहराओगे

    मेरी टूटन में दिनोदिन बढ़ती अपनी निगरानी को

    लोगो

    तुम्हारी प्राकृतिक उत्सुकता

    और सहज कानरस पिपासा का भी

    मैं पूरा सम्मान करती हूँ

    पर केवल इतना याद दिला देना

    आवश्यक समझती हूँ

    महज़ फर्ज़बोध से

    कि तुम कर सकते हो बात

    टूटी सड़क

    बदलते मौसम

    या ख़राब सरकार के बारे में भी।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमेधा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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