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तुम बताओ...

tum batao. . .

शिवम् अवस्थी

शिवम् अवस्थी

तुम बताओ...

शिवम् अवस्थी

और अधिकशिवम् अवस्थी

    मौन के इन मोतियों में, गूँजते हैं साज़ कितने?

    इन झुकी-सी पलकों के, अक्स में परवाज़ कितने?

    तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!

    क्या किसी के अक्स ने, मन के मुकुर को है निहारा?

    क्या किसी को भोर के, तारों ने छुपकर है पुकारा?

    क्या किसी की आहटों पर, धड़कनें नव-छंद रचतीं?

    क्या किसी के वास्ते, आँखें तुम्हारी रात जगतीं?

    सर्द-सी इन धड़कनों में, तप रहे हैं राज़ कितने,

    तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!

    क्या वह मेरे अश्क-सा है, या कोई मुसकान-सा है?

    मेरी ही धड़कन का हिस्सा, या कोई अनजान-सा है?

    राजकुँवर वो कौन है, जो नींद की चोरी करे है,

    किसके ख़ातिर ये कुँआरी, आँख रतजग से भरी है?

    उस छलिये की प्रीत में, तुम भूल बैठी काज कितने,

    तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!

    क्या तुम्हारी चूड़ियों की, खनक में वो नाम-सा है?

    क्या तुम्हारे होंठ पर, वो अनकहे पयाम -सा है?

    मुस्कुरा कर आज अपने, होंठों की गिरहें तो खोलो,

    मौन का शृंगार तज कर, आज कुछ तो सच तुम बोलो!

    देखती हो तुम मुझी में, ख़ुद के ही अंदाज़ कितने,

    तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!

    मैं यथार्थ की ज़मीं पर, नेह का बादल बना हूँ,

    तुम जो कह दो तो मैं समझूँ, मैं ही वो राजकुँवर हूँ!

    तुम मेरी इन धड़कनों की, आज बस आवाज़ सुन लो,

    कल्पना का मोह तजकर, सत्य का आकाश चुन लो।

    टूट कर फिर जुड़ रहे हैं, आज दिल के साज़ कितने,

    तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!

    स्रोत :
    • रचनाकार : शिवम् अवस्थी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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