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तिल-तिल गलैत सुख

til til galait sukh

छत्रानन्द सिंह झा

छत्रानन्द सिंह झा

तिल-तिल गलैत सुख

छत्रानन्द सिंह झा

और अधिकछत्रानन्द सिंह झा

    अंगुरी पर गनल,

    एहन किछ सुखद क्षणकेँ

    मोन पाड़ि,

    अहाँ अपन जीवनकेँ

    किए' गला रहल छी।

    आब अहाँकेँ हमर प्रतीक्षा नहि अछि।

    हुलास,

    आतुरता—

    टूटल मोनक संग बिलोपित—

    भऽ गेल अछि,

    से मानैत छी;

    मुदा सत्ते कहब

    जिंजिरक झनझनी,

    केबारक खटखटी

    आकि

    कॉल-बेलक क्रिङऽऽ क्रिङऽऽ

    अहाँकेँ कोनो परिचित डेगक

    आभास नहि दैत अछि की!

    खिड़कीसँ छनिकऽ अबैत

    अहाँक प्रेमिल कटाक्ष

    हमरा सब किछु मोन पाड़ि दैत अछि—

    स्वागत, मुस्की, आतुरता।

    अहाँ कठोर भऽ गेल छी

    अथवा जिद्दी,

    हमरा ज्ञात नहि।

    मुदा एतबा हम अवश्य जनैत छी

    अहाँ अपन जीवनकेँ

    आक्रोश कुण्ठाक आागिमे

    तपा कऽ गला रहल छी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : एक गुलाबक लेल (पृष्ठ 57)
    • रचनाकार : छत्रानन्द सिंह झा
    • प्रकाशन : नीलकण्ठ प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 1988

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