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ठेला चलाता बाप

thela chalata baap

कुमार विक्रमादित्य

कुमार विक्रमादित्य

ठेला चलाता बाप

कुमार विक्रमादित्य

और अधिककुमार विक्रमादित्य

    सुबह की पौ फटते

    निकल पड़ता है एक बाप

    अपना ठेला ले

    दो रोटी के जुगाड़ में

    जाते जाते चूमता

    अपने वीर्य के अस्तित्व को

    जिसे जन्मने से पहले

    उसने बहाया था ख़ूब पसीना

    रति क्रिया के दौड़ान

    आनंद की असीम अनुभूति के समय

    उसने सपना बोया था

    ठीक उसी तरह जैसे

    मध्यरात्रि के समय देश के हुक्मरानों ने

    एक सुंदर सपना संजोया था

    वो अलग बात है कि

    इधर ठेला से आवाज़ें आती है चूं चें चूं की

    उधर सिगरेट और गाजा की फूँक

    से सपना जल रहा है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कुमार विक्रमादित्य
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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