तीन प्रेमी

teen premi

वियोगिनी ठाकुर

वियोगिनी ठाकुर

तीन प्रेमी

वियोगिनी ठाकुर

और अधिकवियोगिनी ठाकुर

    हाँ मेरे तीन प्रेमी रहे

    मैं उन तीनों के प्रेम में रही उम्र भर

    आप कहेंगे—

    नहीं-नहीं यह झूठ है

    यह हो ही नहीं सकता

    प्रेम सिर्फ़ एक दफ़ा होता है

    या दुबारा होता भी है तो अलग-अलग टुकड़ों में

    कि तुम्हें नहीं है प्रेम के विषय में ज़रा-सा भी ज्ञान

    हाँ मैं भी यही समझती रही

    क्योंकि यह हो सकता है हैरानी का विषय

    जैसे रहा मेरे लिए उन दिनों

    पर अगर कोई मेरा शरीर खोलकर देखे

    देखे उसके दो टुकड़े करके

    तब दिखेगा मेरे प्रेमियों के लिए

    उनका अलग-अलग आरक्षित स्थान

    जहाँ वे परत-दर-परत नहीं

    अपनी-अपनी जगह मौजूद रहे हमेशा

    और मन खोलकर देखे कोई

    तो वहाँ वे मिलेंगे एकाकार

    जहाँ उनका कोई अलग अस्तित्व नहीं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : वियोगिनी ठाकुर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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