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तनुकू द्याखउ तउ!

tanuku dyakhau tau!

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

और अधिकबलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

    तुग मनई हउ घनई!

    फिरि का बिपदा बनई?

    जागि उठउ करउ चेतु,

    अउँघाउ अकुलाउ,

    तनुकु भाखउ तउ!

    तनुकु द्वाखउ तउ!

    तुमरे लरिका बिटिया,

    तुमरे बछिया पँड़िया,

    तुमरइ बर्द्धउ बधिया,

    हयि ख्यातउ खरिहानु,

    तनुकु जानउ तउ!

    तनुकु मानउ तउ!

    लावा को महिमा हयि,

    स्याचउ को केहिका हयि?

    घरु जिहिका तिहिका हयि

    को घेरि घेरि घुसा

    तनुकु द्याखउ तउ!

    तनुकु भाखउ तउ!

    तुमरे घर की माया

    ठलुहा लयि लयि भाजयिं!

    यी घास की कुटकुटी

    का ह्वयि रहा भिंजारु,

    तनुकु जानउ तउ!

    तनुकु मानउ तउ!

    जी जनम के उठल्लू

    ती आजु बड़े पंडित!

    जौनी पतरी चाटयिं

    तिनहे करयिं छेदु

    तनुकु जानउ तउ।

    तनुकु मानउ तउ।

    जो तुमरे घर आवा

    वुहु तुमहे तुम ह्वयि गा,

    अब तनुकु अरसाउ

    बिल्लाउ चिल्लाउ

    तनुकु मानउ तउ!

    तनुकु जानउ तउ!

    तुम घरहे की भाँसड़ि

    मा ह्वयि रहे द्यवाने;

    सब कयि रहे बिलइय्यन

    बँदरऊ क्यार बाँटु,

    तनुकु द्याखउ तउ!

    कुछउ भाखउ तउ!

    तुम हिंद के पुजारी,

    उयि पादरी कि मुल्ला!

    जो द्यास केरि स्वाचउ

    तउ हउ बड़े ‘पढ़ीस’

    अब माखउ तउ!

    तनुकु द्याखउ तउ!

    स्रोत :
    • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 153)
    • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
    • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
    • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
    • संस्करण : 1998

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