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स्वेटर आ प्रेम

svetar aa prem

दीप नारायण

दीप नारायण

स्वेटर आ प्रेम

दीप नारायण

और अधिकदीप नारायण

    अहाँक स्वेटर

    जे बुनला उत्तर

    स्वयं पहिर क' भजारने रही अहाँ

    हल्लुक गुलाबी रंगक

    से मोन अछि अहाँकेँ?

    हम एखन धरि रखने छी जुगुता क'

    जहिया कहियो पहिरैत छी

    होइत अछि जे

    पँजियौने छी अहाँ भरि पाँज।

    फेर जखन-तखन हँसोतथि रहैत छी अपन देह,

    निघारैत रहै छी अएना,

    बतिआइत रहैत छी किछुसँ किछु,

    आँखि नहि बुझि पबैत अछि से

    सहजे बुझि जाइत अछि हृदय!

    एहि स्वेटरकेँ भेटल छैक अहाँक औँरीक सिनेह

    अहाँक दीर्घ सान्निध्य,

    अहाँक देहक गमकैत सुगन्धि

    जाहिसँ महमह करैत रहैत छी हम।

    सिनेह

    जे आइयो हमरा मोन पाड़ैत अछि

    अहाँक लगीच होएबाक,

    सान्निध्य,

    जाहिमे ऊब-डुब होइछ कोनो समय

    जाहिसँ गमकैत अछि

    आइयो हमर साँस।

    स्वेटर नहि

    अहाँक प्रेम अँटल अछि

    हमर कायामे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आब कतेक चुप रहू (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 39)
    • रचनाकार : दीप नारायण
    • प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2021

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