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स्वर्ग की सराय

svarg ki saray

अनुवाद : सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज

चार्ल्स सिमिक

चार्ल्स सिमिक

स्वर्ग की सराय

चार्ल्स सिमिक

और अधिकचार्ल्स सिमिक

    लाखों मारे गए, जबकि हर कोई निर्दोष था।

    मैं अपने कमरे तक महदूद था। राष्ट्राध्यक्ष ने

    युद्ध का ऐसा बखान किया

    जैसे हो कोई जादुई प्रेम-रस।

    मेरी आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गई थीं।

    आईने में मेरा चेहरा ऐसा लगा मुझे

    गोया मैं कोई डाक टिकट हूँ

    जिसे डाकख़ाने ने दो बार रद्द कर दिया हो।

    मैं ठीक से रहा, लेकिन ज़िंदगी भयानक थी।

    उस दिन कितने सारे सैनिक थे

    और शरणार्थियों की अपार भीड़ थी सड़क पर।

    ज़ाहिर है, वे सब मिटा दिए गए

    उँगली की एक हरकत से।

    इतिहास ने अपने मुँह के ख़ून लगे कोरों को धीरे से चाट लिया।

    बिके हुए चैनल पर, एक आदमी और एक औरत

    कामातुर चुंबनों में लीन थे

    और एक दूसरे के कपडे फाड़े जा रहे थे

    जबकि मैं चुपचाप देखता जा रहा था

    आवाज़ बंद कर—कमरे के अँधेरे में

    बस स्क्रीन रह-रह चमक उठती थी

    जहाँ बहुत ज़्यादा था सुर्ख़ लाल रंग

    या ज़रूरत से ज़्यादा रंग गुलाबी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : चार्ल्स सिमिक

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