Font by Mehr Nastaliq Web

स्वप्न

svapn

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

मिलीवौय स्लावीचैक

और अधिकमिलीवौय स्लावीचैक

    (बीसवीं सदी की गहराइयों में)

    अपने चेहरे के पसीने में अगल-बगल करवटें बदलीं

    कंधों के बल लेटा : बताया है इस बारे में

    ज्योतिषियों ने और धर्म के

    संस्थापकों ने

    सनिद्य और सदंड इसका प्रदर्शन किया है।

    लिखा है इस पर दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों ने

    स्थिति का निरीक्षण कर, सुझाते हुए उठना या अच्छा बिस्तर

    नहीं भूले कि मैं मनुष्य हूँ, ज़ोर दिया इस पर प्रत्येक

    ने अपने ढंग से

    (कुछ-कुछ डरते हुए, प्रतिवाद-सा करते हुए)

    लेकिन शायद ही उनमें से कोई पसंद आया मुझे

    दख़ल देने लगे थे बहुत पहले से ही, सुधारक भी, राष्ट्रनायक

    भी, ओह, सेनानायक भी

    स्वाभाविक ही, व्यापारी भी

    बात अधिकाधिक उलझती गई

    क्रांतिकारी भी आए कि अपनी बात कहें

    और मैं हाथ फैलाए लेटा, प्रयत्नरत कि समझूँ, कि पीछा छुड़ाऊँ

    मैं उच्चारण करता रहा गीतों का (गालियों का भी),

    देखता रहा ऊँची, कोमल ध्वजाएँ

    वही अब भी कर रहा हूँ और अब भी कर रहा हूँ,

    अशक्त, भूल भी जाता हूँ

    (अपने चेहरे के पसीने में, अग़ल-बग़ल करवटें बदलते हुए)

    काफ़ी बूढ़ा हो चुका हूँ और आश्चर्यजनक रूप से लंबा

    और खेल अभी जारी है (और इतिहास और काल

    सजे हुए हैं चीख़ते परों से)

    मुझ पर गिर रहे हैं, इस दौरान में, पेच और समूचे रिकार्ड

    प्रगति के

    समय है अब कि मेरे धैर्य का भी अनुष्ठान करें

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 145)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : मिलीवौय स्लावीचैक
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY