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स्वनहुली स्यामा

svanahuli syama

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

और अधिकबलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

    बरगद के तरे बाउली पर

    हिरदउँ के भीतर भाउ भरी।

    उतरी बिन पखनन केरि परी

    वह चंद्र लोक की किरनि जयिसि—

    साँवरि-साँवरि सुन्दर स्यामा।

    रसरी पर नव रस रमे जायिं,

    गगरी तीनिउ गुन भरे जायिं;

    द्याखति मा आँखी खुली जायिं

    उइ सुबरन रेखा केरि झलक—

    जब पानी भरयि लागि स्यामा।

    गज्जी की ब्वढ़नी हयि पुरानि,

    मलु साफु-साफु धोयी-फींची।

    कसि जोति जुआनी आगमु की

    फाटे कपरा ते फूट परयि।

    सुन्दरापा केरि खानि स्यामा॥

    बिरवन पर पंछी झूलि रहे,

    ख्यातन मा सरसउँ फूलि रहे।

    गोरू गउढ़ी पर पुलकि-पुलकि

    लीचर-बछरा कुल्याल मारयिं।

    अल्हर छवि चितयि रही स्यामा।

    पातिन की पहुँची हाथन मा,

    फूलन की चूरामनि बाँधे।

    मुँदरी कनफूल सिंकहुलन के,

    झुमका निमकउरी के झूलइँ।

    का, फूल परी उतरी स्यामा?

    हन्नी की बच्ची छोटि-छोटि

    वह करइ पियारु पलाऊ हयि।

    पुचकारि जगति ते कूदि परी,

    दुलराइ रही, ब्यल्हरायि रही।

    हन्नी ते हन्नी जसि स्यामा।

    तन-मन की सबि सुधि बिसरि रही

    ख्यलबखरी मा पसु पंछित की।

    मन के ब्यकार थर्रायि रहे,

    उयि, तपसी की कन्या आगे,

    असि, दूध की धोयी वह स्यामा।

    भय्या तनकुन्ना आवा, तिहिंका

    दीदी उबहनि दयि दिन्हिसि।

    टेंटे पर गगरी छलक रही,

    वह मुहरु-मुहुरु घर का डगरी;

    हन्नी असि चितयि रही स्यामा।

    कँगला किसान घर जलमी जो

    रोटी-कपरा का तरसयि मुलु;

    साँचे सुख ते सुबरन बरसयि,

    जब 'बापू'—'बापू' ग्वहरावयि—

    बरसायि स्वनहुली छबि स्यामा।

    टुकुवा प्यउँदा घँघरी ते हँसि

    दुनियादारन ते पूँछि रहे!

    यह बिस्व पिता की पुतरी तुम,

    कउनी आँखिन ते देखि रह्यउ?

    आधी उघारि सयानि स्यामा!

    मुलु, राजु-पाटु, रुपया तुमार,

    वहि के ठ्यँगरन पर नाचि रहे।

    माता विथरउती हयिं यी छबि

    पर हीरा-मोती किरनिन ते;

    तन-मन ते पूरि रही स्यामा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 103)
    • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
    • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
    • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
    • संस्करण : 1998

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