Font by Mehr Nastaliq Web

सुख की प्रेरक शक्ति

sukh ki prerak shakti

अनुवाद : रीनू तलवाड़

लुइज़ ग्लुक

लुइज़ ग्लुक

सुख की प्रेरक शक्ति

लुइज़ ग्लुक

और अधिकलुइज़ ग्लुक

    बंद खिड़कियाँ, उगता सूरज

    पंछियों की चहचहाहट :

    बग़ीचे में ओस की हल्की-सी परत।

    और भारी उम्मीद से उपजी असुरक्षा

    की भावना अचानक ग़ायब हो जाती है।

    हृदय अभी भी सजग है।

    और हज़ारों नन्ही आशाएँ उमड़ने लगती हैं,

    जो नई नहीं हैं परंतु नव-स्वीकृत हैं।

    अनुराग, दोस्तों के साथ भोजन।

    और किन्हीं वयस्क कार्यों

    का ढंग।

    घर स्वच्छ, शांत।

    कूड़ा बाहर रख आने की आवश्यकता नहीं।

    यह एक साम्राज्य है, कोई काल्पनिक कृत्य नहीं :

    और अभी सवेरा है,

    पेन्सरेमान की श्वेत कलियाँ खुलती हैं।

    क्या यह संभव है कि आख़िर हम पर्याप्त

    मोल चुका चुके हैं?

    कि बलि देने की अब आवश्यकता नहीं रही,

    कि व्यग्रता और आतंक काफ़ी समझे जा चुके हैं?

    टेलीफ़ोन की तार पर वेग से दौड़ती एक गिलहरी,

    मुँह में रोटी का टुकड़ा लिए है।

    और मौसम की वजह से अँधेरा होने में देर है

    ताकि लगे कि

    यह एक बड़े उपहार का हिस्सा है

    जिससे डरने की अब आवश्यकता नहीं रही।

    दिन चढ़ रहा है, मगर धीरे-धीरे, एक एकांत

    जिससे सहमने की आवश्यकता नहीं, यह बदलाव

    हल्का है, स्पष्ट चीन्हा नहीं जाता—

    पेन्सरेमान खुलते हैं।

    दिन के अंत तक उनके बने रहने की

    संभावना है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : लुइज़ ग्लुक

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY