एकटा समुद्रक अतलतलमे धधकि उठलैक ज्वालामुखी
आर्तनाद कऽ उठलैक ज्वारि
तटशिलापर माथकेँ पटकि-पटकि
सधि गेलैक—सुखा गेलैक।
आ ओही काल रात्रिमे
फूटि गेलैक चन्द्रमा छहोछित्त
ज्योति ओकर टप-टप-टप चूबि-चूबि
लहरि-लहरि पाटि गेलैक
कण-कणमे समा गेलैक—बिला गेलैक।
तरंगक पहाड़ चढ़ल नोआकेर भरल नाओ
छहलि गेलैक बूड़ि गेलैक
कालक गर्भसँ जेना भविष्यक भ्रूण निछा गेल होइक।
नान्हिञेटा चीत्कार, कनिञेटा हाहाकार
आ फेर सभ शान्त जेना
श्मशानक कंकालकेँ खड़खड़बैत बिड़रो चल गेलैक।
सूर्य धरि छैके
आ धरतीयो घुमिते छैक अपन कीलपर
मुदा एक गोलार्ध धसि गेलैक
आ दोसरमे दड़कि गेलैक क्रेटर अतलान्त
स्याह तप्त लावाकेर पमारामे ध्वस्त पोत जकाँ
थरथर थरथराइत क्षितिज डुबि गेलैक
स्वप्न रंगी स्वप्न सनक अनभुआर एकटा मोरनी
ता-थैया नचैत-नचैत फड़फड़ा कऽ
खसि पड़लैक खौलैत अलकतरामे
माटिमे-पानिमे, आकाश-पातालमे
बर्फमे-बसातमे, इजोत-अन्हारमे
जतऽकतौ मनुक बेटा बाँचल छैक बेचारा
हुकरैत छैक अपरिहार्य श्वासक भारसँ
कुहरैत छैक घोर आत्मदाहसँ।
- पुस्तक : मैथिलीक नव कविता (पृष्ठ 167)
- संपादक : रामकृष्ण झा ‘किसुन’
- रचनाकार : धूमकेतु
- प्रकाशन : सांस्कृतिक विभाग, राष्ट्रीय सार्वजनिक मेला समिति, सुपौल, बिहार
- संस्करण : 1971
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