सिर्फ़ मरते हैं यहाँ. . .
sirf marte hain yahan. . .
सिर्फ़ मरते हैं यहाँ हिंदू, मुसलमाँ या दलित,
अब किसी भी जगह पर मरता नहीं है आदमी।
बँट गए अब तो स्वयं भगवान कितनी जात में,
अब सभी की अर्चना करता नहीं है आदमी।
धर्म, जाति और भाषा के लिए लड़ता है ये
जान लेने में भी अब डरता नहीं है आदमी।
अपने ऊपर आए संकट, तो सभी हरते पर–
देश पर दुःख आए तो, हरता नहीं है आदमी।
दिख रहा है देश टूटा, धर्म में औ’ जात में,
किन्तु फ़िर भी देख ये, सुधरता नहीं है आदमी।
रोज़ ही इंसानियत की लाश मिलती हैं यहाँ,
जात मरतीं, धर्म मरते, मरता नहीं है आदमी।
- रचनाकार : सूर्य प्रकाश शर्मा
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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