Font by Mehr Nastaliq Web

सिहरै बदन जब भीग जाय चोली है

siharai badan jab bheeg jaay choli hai

परवाना प्रतापगढ़ी

परवाना प्रतापगढ़ी

सिहरै बदन जब भीग जाय चोली है

परवाना प्रतापगढ़ी

और अधिकपरवाना प्रतापगढ़ी

    फगुनी बयार चलै रँगना फुहार चलै,

    घुँघटा उधार नारि करत ठिठोली है।

    देवरा से बोलै लागी भाभी मुस्काय आज,

    लागत करेजे मोरे बुढ़ऊ कै बोली है।

    बिरहा की आग जरत बाटै मन मोर,

    गाँव-घर मिल सब खेलि रहें होली है।

    भर पिचकारी मोरी देहिया पे डारि गये,

    सिहरै बदन जब भीग जाय चोली है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रस गागरी (पृष्ठ 57)
    • रचनाकार : परवाना प्रतापगढ़ी
    • प्रकाशन : अभिव्यक्ति संगम, साहित्यिक संस्था, लालगंज प्रतापगढ़
    • संस्करण : 2013

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY