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सीढ़ियाँ

siDhiyan

सुमेधा

सुमेधा

सीढ़ियाँ

सुमेधा

और अधिकसुमेधा

    लंबा, इकहरे बदन का वो लड़का

    जिससे मेरी बहन ने प्रेम किया था

    जिसे मेरी बहन ने साथी चुना था

    कुछ दिन हुए

    नहीं रहा

    उसकी जगह ले ली

    एक बलवान मर्द ने

    जो दिखाता है अपना बल

    बहन की देह पर

    चोट के निशान देख जब मैंने पूछा

    सकुचाकर बोली:

    सीढ़ियों से गिर गई थी

    मुझे अनायास ही याद हो आई

    माँ ताई मौसी नानी और बुआ

    याद हो आया उनका सीढ़ियों से गिरना

    खपरैल के घर और फूस के झोपड़ों में भी।

    एक बार छुटपन में

    मैंने पूछा था

    चाची तुम्हारे घर में सीढ़ियाँ कहाँ हैं?

    भोजन करते चाचा को पंखा झलती चाची

    तपाक से बोली

    मर्द तो है फिर हँस दी

    जाने कितनी बार

    देखी मैंने वह हँसी

    अलग-अलग चेहरों पर

    रोष और करुणा से भरता रहा मन

    पर देखी वह हँसी कल

    जब बहन के चेहरे पर

    रोष और करुणा से नहीं

    भय और प्रश्नों से भर गया मन

    क्या सारे लड़के मर्द हो जाया करते हैं

    क्या सारी लड़कियाँ सीढ़ियों से गिरती रहती हैं

    क्या बहन का चेहरा एक दिन आईना हो जाएगा?

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमेधा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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