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शोकगीत

shokagit

अनुवाद : सुरेश सलिल

वोले सोयिंका

वोले सोयिंका

शोकगीत

वोले सोयिंका

और अधिकवोले सोयिंका

    (एक)

    आज भी तुम अपने धुँधले नक़्शे-पा छोड़ते हो ऐसे

    मानो जमे तालाब के सीने से बस्स छू-भर रहे हों,

    जमे तालाब का सीना

    अँधेरे का जहाँ मुश्किल हुआ जीना,

    बगुलापंखी चँदोबे-सा तुम्हारा प्यार

    जैसे रेशमी जाली।

    (दो)

    ख़ुश्क हवा का यह मर्सिया अब सुनते जाओ!

    यह वक़्त सबक़ लेने का है

    और तुम मुझे अजनबी अशांति के बीच

    निर्वेद समापन की सीख दे रहे हो!

    शफ़क़ जब लेती है ज़मीन का बोसा

    तो उसे सिर्फ़ एक ही नाम दिया जा सकता है—

    उदासी।

    (चार)

    तो आबद्ध होने दो अपनी हथेली को

    सिरे से सिरे तक, मेरी हथेली के साथ।

    और बीच की क्षीण-मलिन धरती

    पालेगी-पोसेगी हमारे प्यार के वर्जित शिशु को,

    और बस।

    ...

    तूफ़ान की सरसराहटों ने तुम्हें बाहर ढकेल दिया

    जहाँ एक बार हमने अपने हाथ आबद्ध किए थे।

    अकेले मैंने ही (अँगुलियों की) संधों से

    धरती को झरते हुए देखा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 437)
    • रचनाकार : वोले सोयिंका
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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