Font by Mehr Nastaliq Web

शहर की दुनियाँ

shahr ki duniyan

राजेश राजभर

राजेश राजभर

शहर की दुनियाँ

राजेश राजभर

और अधिकराजेश राजभर

    ज़िंदगी के कई रूप देखना है,

    तो शहर जाओ,

    बड़ी अनोखी है—शहर की दुनियाँ!

    टूट कर बिखर जाना,

    बिखर कर, मिल जाना

    ऐसे कई इम्तिहान लेती है!

    शहर की दुनियाँ,

    आकाश की ऊचाईयों से लेकर,

    जलधि की गहराईयों तक,

    निर्भीक खड़ा दीप्तिमान शहर,

    अपनी बाँहें फैलाए,

    सच और झूठ के,

    असीम कल्पनाओं का बाज़ार है,

    तन-मन, ख़ुशी-ग़म, मान-सम्मान के,

    जहाँ लाखों ख़रीदार हैं!

    सफ़लता, असफलता,

    आधार, निराधार की दंतकथाएँ!

    उभर कर मिट जाती हैं,

    कल्पना से परे, लाखों तरुणाई

    अपना इतिहास लिख जाती हैं!

    रात की चकाचौंध, दिन के उजाले...

    थकते नहीं—चलने वाले,

    लक्ष्य सभी का हैं, एक

    किसी तरह, भर जाए पेट

    खुली सड़क-मदारी की नाच

    काँच की गुड़िया रस्सियों पर

    जब— अपना कर्तव्य दिखाती हैं!

    रोटी के इस खेल में,

    कभी-कभी, टूट कर बिखर जाती है!

    फूल माला, लिए माली—

    दुकान से मचान तक चढ़ जाए,

    बिक्रीदार, वज़नदार, मालदार—

    एक-दूसरे से आगे निकल जाए!

    गतिशील शहर, ऊँचे स्वर की चीख़,

    तंग गलियों में सिसकती तंहाई

    रेहड़ी, पटरी, भाड़ेदार...

    जिनकी होती हर दिन रुसवाई!

    शिक्षा से वंचित नौजवान

    खुले आसमान में पत्थर तोड़ता है!

    वृद्ध—मजबूरी का मारा बेचारा,

    पेट के लिए गली-गली, हाथ जोड़ता है!

    यहाँ रिस्तों का हर एक धागा

    नफ़ा नुकसान पर चलता है,

    अपरिचित मित्र भी कहीं कहीं

    काम का निकलता है,

    असंभव कुछ भी नहीं!

    रात और दिन—आठों पहर,

    शहर की मंडियों में सौदा—

    निचले अस्तर का होता है!

    मानवता, ईमान क्या...

    इंसान तक बिक जाता है!

    सच कहें—आदमी की ज़रूरतें—

    उसे शहर तक खींच लाती हैं,

    और फिर—ज़िंदगी के

    कई रूप दिखाती हैं!

    स्रोत :
    • रचनाकार : राजेश राजभर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    संबंधित विषय

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY