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शब्द

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धूमकेतु

धूमकेतु

शब्द

धूमकेतु

और अधिकधूमकेतु

    एहने क्षणमे महाकाल ताण्डव रचैत छथि,

    शब्द प्रकट होइत अछि भास्वर।

    शस्त्र कथमपि कऽ सकत नहि शब्द भेदन,

    तहियो कऽ सकल नहि

    जहिया सभामे पांचाली भऽ गेली बेनग्न

    आर गादी उचङि लेलक आन्हरक अओलादि।

    शब्द मनुखक दिग-दिगन्तिक व्याप्ति

    शब्द थिक परिचय मनुक्खक।

    अस्सलाम वालेकुम!

    बौआ, लाले लाल सलाम

    लीखि देलें बारुदक मुँहपर

    अपन रक्तसँ शब्दक गरिमा

    दे वाणीके मोल करेजक रक्त द्वारसँ

    खोलि छोड़बें निश्चित

    एक दिन थिएन आनमन

    अही ठाम एतै धरतीपर

    जन्म लेतौ कहियो सभतरि

    तोहरे समधर्मा

    कालक कोनो अवधि छै?

    धरती बड़की टा छै।

    जाबत धरि अछि शब्द शेष

    धरती अम्बरमे

    ताबत धरि बंदूक गहय

    से मनुखक दुश्मन थिक

    जा धरि मनुखक प्राण

    शब्दसँ हो आलोड़ित

    ता धरि अस्त्रक भाषा-भाषिक

    बध निश्चित पावन थिक।

    दहिन हाथ मे हरियर चारा

    बामामे बंदूक

    प्यासल सत्ता माँगय अगबे

    तप्पत शब्दक खून।

    शब्दक द्रष्टा! सावधान!

    कालखंड सरिपोँ आन्हर अछि

    आबि तुलायल महासमर फेरो निर्णायक।

    फेर एक बेर हकक बातपर,

    भरल सभामे सधा जाइत अछि चुप्पी

    फेर एकबेर बुद्धि

    शब्दक संग बलात्कारक

    मक्कारीपर आमादा अछि।

    फेर एक बेर ज्ञान भेल अछि रण उद्दीपित

    फेर एक बेर मनुखक कुल उपलब्धि

    मनुष्यताक प्रतिपक्ष ठाढ़ अछि।

    युद्ध घृणित थिक

    कथमपि नै थिक नियति मनुक्खक

    किन्तु शब्दक बधक निमित्तेँ जखन-जखन

    सरंजाम जुटल अछि गुपचुप

    तँ साक्षी अछि इतिहास

    कोनो गुफ्फ भट्टीमे पाकि-पघिलि

    शब्द स्वतः ढारै अछि कविता संरचना।

    स्रोत :
    • पुस्तक : मैथिलीक नव कविता (पृष्ठ 9)
    • संपादक : राजमोहन झा
    • रचनाकार : धूमकेतु
    • प्रकाशन : आरम्भ
    • संस्करण : 1996

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