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मनु-सन्तान

manu santan

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    नव चिन्तन, नव भाव-भूमिपर नव-नव सृष्टि-विधान,

    करय नित नूतन मनुसन्तान।

    क्षितिपर, जलपर, आर पवनपर,

    वितल, तलातल, सकल भुवन पर,

    अन्तरिक्षसँ पार गगन पर,

    चन्द्रलोक, नक्षत्रलोक धरि अपन सफल अभियान,

    करय नित नूतन मनुसन्तान।

    तनपर, मनपर, जड़-चेतनपर,

    प्रकृति-प्रदत्त सकल साधनपर,

    पञ्चतत्त्व-निर्मित कण-कणपर

    आर अधिक की, जन्म मरणपर स्वामित्वक अभिमान,

    करय नित नूतन मनुसन्तान।

    भ्रमण करक हित नभ अनन्त ई,

    नव ज्योतिर्मय दिग्-दिगन्त ई,

    सभ्यताक वनमे वसन्त ई,

    सर्व-शक्ति-सम्पन्न कहाबय एक मात्र विज्ञान,

    जकर कर्त्ता थिक मनुसन्तान।

    किन्तु विजय नहि अहंभावपर,

    मनक कलुष, विकृतिक प्रभावपर,

    मनुज चलय दनुजक स्वभावपर,

    तकनहुँ पाबि रहल नहि कत्तहु दानवताक निदान,

    विकल आकुल मन मनुसन्तान।

    आइ मनुजता ग्रस्त रोगसँ,

    करुणा मनुजत्वक वियोगसँ,

    कानि रहल अछि हृदय-दोगसँ,

    छापि रहल अछि भाव-गगनकेँ चौदिस तिमिर-वितान,

    चकित मन देखय मनुसन्तान।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 346)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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