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कहू कुशल

kahu kushal

जकरासँ जेम्हरे भेट होइछ

से सब पुछैत अछि—'कहू कुशल'!

बुझना जाइत अछि जेना—

एहि युगसँ स्वयम् अपरिचित हो।

एकरा करेजमे नहि लगैत छै युगक धाह?

एकरा खबरि छै आइ मानवक द्वारेँ मानव अछि तबाह?

नहि जनैछ जे पाखण्डीक हृदय होइत छै केहन स्याह?

नहि एकर कान सुनि सकल अछि

जग-विध्वंसक विस्फोट सदृश

सद्यः स्फुलिंग सन तेज

करोड़ो पद-दलितक करुणार्द्र आह?

एखनहुँ धरि जीवन-पथक गरल कण्ठक नीचाँ नहि जा सकलै

एखनहुँ धरि एकरा हृदय कुहरमे

मानवता समा सकलै,

चलिते-चलिते पिच्छड़ पथपर

प्रायः कहियो नहि हूसल,

तेँ ने पुछैत अछि कहू कुशल!

जकरामे कनिञो छैक चेतना लेश मात्र,

से नहि जनैत अछि सुख, जनैत अछि क्लेश मात्र,

खाली पहिनेसँ छलै घैल दूधक,

परन्तु खाली छै सम्प्रति छोट-छीन जलपात्र मात्र

सौँसे जीवन सोझाँमे पड़ल पहाड़ जकाँ

तनमे हड्डीकेर छैक बचल अवशेष मात्र,

की कहियो क्षुधा-पिपासावश,

तृष्णावश, घृणा-निराशावश

कऽ कुत्सित कर्म, तखन अपने अन्तरसँ

गेल अछि धूसल

तेँ ने पुछैत अछि कहू कुशल!

हमरा तँ बुझना जाइछ जे हमर देश

हड़बड़मे जे किछु पौलक अछि

तकरासँ बीस गुना बेसी मङनीमे जाय गमौलक अछि।

युग बाजी लगा बढ़ल पथपर

पहिने जे जाय मनुजताकेँ धकिया कऽ

नीचाँ खसा सकत, से बैसत जा स्वर्णक रथपर,

सब घूमि रहल 'इति' लग सरिपहुँ

बूझि रहल अछि—छी 'अथ'पर।

ककरा कहबै, के कान देत?

अनका लय के बलिदान देत?

एसगर-दोसगरमे जँ पौलक तँ चूसि लेत शोणित समेत,

एकरा सब नहि छैक पता

सब थिक पिशाच, सब थीक प्रेत?

छथि जखन विधाता धरि रूसल

तँ की पुछैत अछि कहू कुशल!

जीवन थिक बड़का जहाज,

जकरा ओहि पार लगयबामे कोइला-पानिक पड़तैक काज

अन्हड़-बिहाड़िमे संग देत

से सम्मुख अछि आन्हर समाज

स्वार्थक ज्वाला धुधुआय रहल तँ ककर पुछारी के करतै?

अपनासँ छुट्टी छैके ने आनक हाथ कोना धरतै?

जनिका मुट्ठीमे सत्ता छनि

तनिका कर शोभित छनि मूसल,

नहि पुछैत छथि कहू कुशल,

जकरासँ जेम्हरे भेट होइछ

से सब पुछैत अछि कहू कुशल!

स्रोत :
  • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 369)
  • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
  • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
  • संस्करण : 2025

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