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सौ रुपए का मोक्ष

sau rupe ka moksh

ऐश्वर्या तिवारी

ऐश्वर्या तिवारी

सौ रुपए का मोक्ष

ऐश्वर्या तिवारी

और अधिकऐश्वर्या तिवारी

    कोई नहीं देखता

    एक साइकिल-रिक्शा वाला

    दौड़ा चला जा रहा है;

    पीछे हाँफती साँसें,

    आगे जलता सूरज,

    बीच में उसकी ज़िंदगी

    पतले से टायर पर टँगी हुई।

    मोक्ष की नगरी है यह,

    जहाँ घाटों पर लोग

    देह डुबोकर पाप धोते हैं,

    और गलियों में लोग

    देह गलाकर जोड़ते हैं रोटियाँ।

    कल मैंने मुस्कुराते हुए उससे कहा—

    ठंड कितनी बढ़ गई है ना!

    आपको ठंड नहीं लग रही

    वो बिना हँसे,

    बहुत सीधी आवाज़ में बोला—

    ठंड बैठे हुओं को लगती है मैडम

    हमें तो तब ज़्यादा महसूस होती है

    जब हम रुक जाते हैं…

    जब रुक जाते हैं चक्कर हमारे

    तब हवा हड्डियों तक चीरती हुई

    पहुँच जाती है सीधे आर-पार।

    उसकी बात जैसे

    सिर्फ़ मौसम का नहीं,

    ज़िंदगी का फ़र्क समझा गई।

    हमारी ठंड

    एक स्वेटर, एक शॉल,

    और किसी कैफ़े की गरम चाय से

    संभल जाती है;

    उसकी ठंड

    दिहाड़ी रुकते ही

    सीधे पेट और हड्डियों में

    उतर जाती है।

    सिर्फ सौ रुपए के लिए

    मोक्ष की नगरी में

    माया की जद्दोजहद देखो—

    एक ओर ग्राहक की कर्कश पुकार,

    “भइया, जल्दी चलो, देर हो रही है”,

    दूसरी ओर भीतर का टूटा हिसाब:

    दूध, दवाई, स्कूल की फ़ीस,

    और माँ के लिए सस्ती-सी साड़ी।

    उसकी साँस

    किसी पुराने भजन की

    टूटी हुई तान हो जैसे

    जो पहिए रूपी सितार पर

    द्रुत और विलंबित चलती है।

    माथे का पसीना ऐसे बहता है

    मानो गंगा से कह रहा हो—

    मेरे पाप नहीं,

    मेरी भूख धो देना।

    घाटों पर आरती की लौ काँपती है,

    शंख फूटते हैं ऊँची आवाज़ों में,

    और ईश्वर को पुकारती भीड़ के बीच

    एक आदमी चुपचाप

    ईश्वर जैसा करता है श्रम—

    रिक्शा खींचता,

    अपना ही वजूद ढोता

    गली से गली, मोड़ से मोड़।

    कुंडों की तरफ़ बढ़ें तो लोग

    दिखते हैं पिछले जन्मों का हिसाब साफ़ करते,

    जबकि कोई है जो सिर पर रखे गमछा

    इस जन्म की उधारी से

    नज़रें नहीं मिला पाता।

    किसी के लिए मोक्ष

    त्रिपुंड, रुद्राक्ष, मंत्र है,

    तो किसी के लिए

    भरपेट दाल और रोटी

    एक सही चलने वाला पंखा,

    और किराए की पर्ची पर

    “आज नहीं काटेंगे” की मेहरबानी।

    साइकिल की हर घँटी

    जैसे घोषणा करती है—

    मैं स्वर्ग नहीं माँगता,

    बस आज की साँसों से

    कल की भूख तक

    एक पतला-सा पुल चाहिए।

    शहर ऊपर-ऊपर

    हर-हर महादेव में डूबा है,

    अंदर-ही-अंदर

    हर-हर माह देई की किश्तें गिनता है वो—

    किराने वाले को देना है,

    स्कूल वाले को देना है,

    और फिर भी बच्चों के सामने

    हँसकर कहना है—

    लो, कलम तो ले ही लो,

    किताबें बाद में भी जाएँगी।

    असली मोक्ष शायद

    कहीं घाट पर नहीं,

    उस क्षण में छिपा है

    जब वो रात को लौटकर

    थकी टाँगों से चप्पल उतारता है,

    बेटी दौड़कर

    उसकी गोद में चढ़ जाती है,

    जिसकी हँसी में

    गंगा की पूरी धार

    एक पल को ठहर जाती है।

    सौ रुपए की क़ीमत पर

    मोक्ष की नगरी में

    जो खेल चल रहा है,

    उसे कोई शास्त्र नहीं लिखेगा;

    पर अगर कभी इतिहास

    पसीने को भी ग्रंथ माने,

    तो पहले पन्ने पर

    साइकिल-रिक्शा वाले का

    नाम दर्ज़ होगा।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ऐश्वर्या तिवारी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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