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सतखंडेवाली

satkhanDevali

सँझबतिया सुरजा-बइठनि

गउ-धूरि केरि वह ब्यरिया।

चउक के चउ-मुहाने पर,

जब चकित थकित ह्वयि देख्यन

समहे तुमहे बइठी हउ

रूप के समुंद्र अन्हाये

खिरकी पर महकि रही हउ,

सुंदरि सतखंडेवाली।

आँखिन ते आँख मिलउतयि

बसि, बहयि पुरानि ठठोली।

कसि कयि तिरछी चितवनि पर

बउछार किह्यउ बानन की!

यह अबकिउ केरि तयारी

माटी मा मेटि मिलायउ,

असि जफा कसी! अलबेली

प्यारी सतखंडेवाली।

उहु पहिल पहिल दिनु कसिकयि,

हम तुमते पहिले जाग्यन?

कुछु किहे नसा-पानी-अस

फिरि झूमयि-घूमयि लाग्यन।

तुम देखि, दाबि कनिया मा

फेंक्यउ अंटा ते खाले

कस गिरय्न नापदाने मा

सुंदरि सतखंडेवाली।

बस यिहे चूक पर चपला

कँगला कयि डारय्उ रानी।

जब मिलिउ तनुकु तालन पर

कउँधा-अस कउँधि गयिउ तुम।

हम तेलु-फुलेलु लगाये

किन्नर-कुमार बनि आये,

मुलु मटक-मटकि मटकाओ

प्यारी सतखंडेवाली।

जब पाउब पकरि पिछउरा

समुझब युहु ट्वाना टटका।

तुमरे पियार के आँसू

हमका कस पघिलयिहयिं।

तुम का छाती मा कसि कयि

हाँ अथयि जाब ऊसर मा!

तब रूपु-अरूपु द्यखायउ

सुंदरि सतखंडेवाली।

स्रोत :
  • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 116)
  • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
  • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
  • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
  • संस्करण : 1998

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