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सारी नावें जिस नदी में चलती थी

sari naven jis nadi mein chalti thi

सत्यव्रत रजक

सत्यव्रत रजक

सारी नावें जिस नदी में चलती थी

सत्यव्रत रजक

और अधिकसत्यव्रत रजक

    जब पूरा शहर सिगरेट हो चुका था

    हमें सिगरेटों से भी बू आने लगी थी

    जगह-जगह पर जब कविता राष्ट्रगान पर बावन सेकण्ड खड़ी हुई थी

    हम मातृभूमि में पैर बचा-बचा कर रख पाते थे

    हो चुकी थी जहाँ पंक्ति-पंक्ति तक तांत्रिक

    हम अपना ताबीज स्वयं ही भरना सीख चुके थे

    जैसा कि उन्होंने कहा बहुत अच्छा पैसा लेकर बहुत अच्छी कविता लिख देंगे।

    हमने उस चलती नाव से पैर वापस किए।

    पूँजी ने हमसे बहुत कुछ कहा उस दिन और उपसंहार ये था कि कवियों वाले कपड़े पहनने चाहिए.

    हम उधार के साहसी नहीं थे तो उस नाव से भी पैर वापस कर लिए

    हमारा मोटा-मोटा हिसाब था कि हमें कविता का जीवन चाहिए था कविता की ऋतुएँ और कविता की ही मृत्यु चाहिए थी।

    हम बहुत अधिक जाली और लगभग सदाबहारों से पीड़ित थे।

    हमने सब नावों में झाँका

    राजधानी की तो नदी प्रदूषित थी

    सारी नावें जिस नदी में चलती थी वह उत्तर भारतीय कवियों के मैले से गाढ़ी हो चली थी।

    अब हम दूर(?) से देखते हैं यह नदी किस समुद्र में जा रही है

    स्रोत :
    • रचनाकार : सत्यव्रत रजक
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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