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साओनक एक साँझ

saonak ek saanjh

काञ्चीनाथ झा 'किरण'

काञ्चीनाथ झा 'किरण'

साओनक एक साँझ

काञ्चीनाथ झा 'किरण'

और अधिककाञ्चीनाथ झा 'किरण'

    नील-श्यामल मेघ छल भरि आयल

    आकाश छल लागैत

    जनि हो नील सागर शान्त।

    धानक बाध मंजुल हरित सागर

    क्षितिज तटपर, गाछ वृक्षक पंक्ति कारी

    बुझि पड़य जनि

    क्यो बान्हि देलक आरि

    जाहिसँ दुनू सिन्धुक पानि भय जाय

    मिजहर।

    मिथिलाक स्वर्ग युगकेर गबाही

    सत्यवादी गबाही सन, सतौल ढाहल

    देवसागरकेर महार,

    जनि छल देखि

    फुलकित होइत।

    ओकर पुलक स्वरूप भकड़ार फुलैल

    कनैलक बोनमे छल लुधकल

    तरुणी-किशोरी-बाला बिआहलिकेर मंडल

    रंग-बिरंगक चित्तिर बित्तर साड़ी पहिरने

    टिकली समान प्रसन्न

    फुद्दी सनक चंचल

    चहरा जकाँ चहकैत।

    क्यो चढ़ि कय गाछपर

    क्यो डारि नमाय

    क्यो कुदि कुदि फूल छलि तोड़ैत।

    भरल साजी पाबि

    देखि साँझकेँ सहटल अबैत

    चललि सभ।

    बाध आकाश दिस ताकैत—

    कहल, नेता जकाँ तरुणी एक, ढिठगर स्वरेँ—

    सखि केहन छल बुधिआर पंडित

    जे एहन सोहाओन मासमे

    कय देलक विधान

    मसुरामनी सन मधुर पाबनिकेर?

    सभ जनि, हृदयसँ कयलक समर्थन

    जनि मधुर मुस्कानसँ।

    ओकर सहबहक आन्तरिक उल्लासकेर

    आभास टा बहरैल

    बनि कय हास

    ठोरपर नाचैत

    भौंह टेढ़ करैत

    वक्षकेँ डोलबैत

    आँखि सबहक

    घरि घुरि निज वक्ष छल तकैत

    जनि सिकारिक नजरि सदिखन

    निज हथियारपर अछि जाइत।

    पोखरिक किन्हेरमे, कृष्णाकुमारी

    पुरान फाटल मैल नूआसँ कोनहुना

    देहकेँ झाँपैत,

    मायक संग मिलि तोड़ि करमी-साग

    खोंछिमे कोंचैत कहलक

    माय! केहन डेराओन छइ मेघ करिया?

    राति फेनो हेतइ बरखा!

    कोना जेतइ बाउ?

    थाल-कादो पानि-पिच्छड़ बाटपर चलि

    केरा कि कटहरक भार लऽ कऽ?

    रोपनिक झमारल देह,

    गोड़ डाँड़ पीठ पाँखुड़ घाड़ डेना

    रहै छै दरदैत दुखाइत

    रहि जाइए कुहरैत भरि भरि राति

    या पायरमे छइ पानि लागल।

    झौंसिदी ओइ पंडितक मुह

    जे एहन बिकट बिकाल दिनमे

    जानि सुमानिकऽ बनौलक अपन पाबनि।

    खायत चूड़ा दही केरा बमनिया सभ

    संग मिलि रभसैत

    सौख पुरतैक अपन बेटी, पुतोहुक

    कोंढ़ टूटत हमर बापक।

    घाड़ उठाय, लैत दीर्घ निसास

    कहलकै माय—“बेटी!”

    कोनो जातिक रहौ बेटी, ओकर भाग-सोहाग

    छीक हरखक बात, जनी जातिक लेल।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कतेक दिनक बाद (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 77)
    • संपादक : डॉ कैलासनाथ झा, शिवशंकर श्रीनिवास
    • रचनाकार : काञ्चीनाथ झा 'किरण'
    • प्रकाशन : किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान (धर्मपुर, लोहना रोड, दरभंगा)
    • संस्करण : 1989

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